जीवन जो मैंने चुना नहीं...
स्कन्दबहुत खुशनसीब होते हैं वो ख्वाहिशें जिनके पूरा होने का इंतजार करती हैं। कुछ बनने की, कुछ करने की... कुछ गुनने की ख्वाहिश पाले उन सभी लोगों से मुझे जलन होती है जो अपनी मर्जी और शतार्ें पर जीते हैं, अपनी उम्मीदों को पूरा होते हुए देखते हैं। जलन होती है क्योंकि मैं वो नहीं कर पाता जो चाहता हूं। न बेहतर सोच पाता हूं, ना अच्छा लिख पाता हूं, न दूसरों की किसी भी तरह मदद कर पाता हूं। और तो और अब लगता है कि अच्छा महसूस भी नहीं कर पाता हूं। इतना सबकुछ ठस सा हो गया है कि कुछ मजा ही नहीं आ रहा है। पता नहीं क्या करने में मुझे सुकून मिलेगा। यह भी ठीक से नहीं समझ पा रहा हूं। आजकल ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा हूं जिससे आत्मसंतोष हो। बस हर रोज सोचता हूं कि नौकरी करते-करते सड़ जा रहा हूं...। सड़ जा रहा हूं क्योंकि कुछ करने से डरता हूं। इतना कमजोर आत्मबल। धत यार कभी-कभी तो...। ऐसी असमंजस की स्थिति बनी है कि क्या बताऊं । काफी पहले काशी बाबा (काशीनाथ सिंह) की एक कहानी पढ़ी थी। उसका शीर्षक तो याद नहीं लेकिन सारांश कुछ ऐसा है-एक बाबू जिसकी जन्दिगी का सबसे सुनहरा और अहम हस्सिा दफ्तर में बाबूगीरी करते-करते ढलान पर पहुंच गया था रिटायर होने के बाद पहाड़ों पर बने अपने घर में रहने पहुंचता है। परिवार के साथ जन्दिगी गुजर रही है कि एक शाम बाबू की नजर पहाड़ों के पीछे डूबते हुए सूर्य पर पड़ती है। प्रकृति का इनता खूबसूरत हस्सिा भी है उस दिन वह यह सोचकर एक टक उसे निहारता रहा। घर में खेल रहे बच्चों को बुलाकर कहता है देखो बच्चों पहाड़ों के पीछे कुछ दिखाई दे रहा है।... हां आसमान, कहते हुए बच्चे वहां से भाग जाते हैं। फिर बाबू चूल्हे पर खाना बना रही पत्नी को बुलाता है और कहता है देखो वहां पहाड़ों के पीछे कुछ दिखाई दे रहा है। पत्नी कहती है, हां मजूदर खच्चर पर सामान लादे जा रहे हैं। बाबू गुस्से में भड़कते हुए कहता है अरे जरा ध्यान से देखो वो... पहाड़ों के पीछे। पत्नी कहती है हां वहां सूर्य अस्त हो रहा है। बाबू चहकते हुए कहता है हां देखो कितना खूबसूरत लग रहा है। पत्नी इस पर क हती है इसमंे क्या खूबसूरत, सूरज तो रोज ही डूबता है। बाबू पत्नी की बात पर झल्ला जाता है और झिड़कते हुए वहां से यह कहते हुए भगा देता है कि जन्दिगी भर चूल्हा फंूकी हो जाओ वही करो । बाबू सूरज को अस्त होने तक निहारता रहा। देर शाम को रोज की तरह साथियों की बैठकी में पहंुचा। कुछ देर कश्मश में रहने के बाद आखिर पूछता है आप लोगों ने आज शाम को कुछ देखा। साथियों ने एक सुर में पूछा क्या कोई घटना हो गई थी क्या बाऊ साहब। अरे नहीं भाई। कुछ सकुचाते हुए कहा... किसी ने आज सूरज को डूबते हुए देखा क्या? आश्चर्य से सभी एक-दूसरे का मुंह देखकर जोर से हंस दिए। इस पर बाऊ साहब गुस्से में उठकर वहां से चल दिए। उनके मन की बात कोई नहीं समझ पा रहा था। घर पहुंचे काफी देर तक गुमसुम बैठे रहे। पत्नी ने खाने पर बुलाया तो बोले भूख नहीं है तुम लोग खा लो। धीरे-धीरे कर सभी लोग पास इकठ्ठा हो गए। पूछते रहे काहे बाबू जी तबियत खराब है या हमसे कोई गलती हो गई। बाबूजी यह कहते हुए फफक पड़े कि तुम लोग मुझे समझ नहीं पा रहे हो। सब लोग मुझे पागल समझ रहे हैं। उनके साथ ही बिना कुछ समझे बूझे परिवार भी फूट-फूटकर रोने लगा। काशी बाबा की वह कहानी मेरी पसंदीदा कहानियों में से एक है। मेरा भी तो जीवन एक कमरे से लेकर दफ्तर तक सिमटा हुआ है बल्किुल उसी बाबू की तरह। जन्दिगी के दोनों खूबसूरत पल गायब हैं। महीनों में नसीब होता है सुबह और शाम देखना।...सुबह और शाम जीवन के वह खूबसूरत लम्हे जब आप कुछ सोच सकते हैं, बंद दीवारों से निकलकर खुली हवा में सांस ले सक ते हैं। कभी-कभी सोचता हूं नौकरी छोड़ दूं। लेकिन फिर आगे यही सवाल मुह बाए खड़ा रहता है कि काम छोड़ दूंगा तो करूंगा क्या। क्या पढ़ंूगा, क्या रचूंगा। बिना पैसों के कहां घूमने जाऊंगा। बाहर इतनी बेरोजगारी है कि देखकर डर लगता है। डर लगता है कि कहीं पूरी जन्दिगी न खराब हो जाए। खैर वैसे भी क्या जी रहा हूं...यार। उधार की लगती है ये जन्दिगी। कुछ लोगों ने सलाह सन्याशी बन जाओ अब इतनी खूबसूरत दुनिया में सन्याशी तो किसी सूरत में नहीं बनूंगा। और सन्याशियों की नजर से दुनिया में दिखेगा ही क्या। जबकि मैं इसको भोगना चाहता हूं... जी भर कर। हर वो काम करना चाहता हूं जिसे करने की इच्छा मन के किसी कोने में दबी है, जिससे मैं हर दिन मुह चुराता हूं... जो मुझ पर हर रोज हसती है। एक तो साला ये नौकरी नाम की चीज बड़ी गड़बड़ है। काम का समय नर्धिारित है। हर दिन दफ्तर जाना ही जाना है। किसी दिन जब एकदम इच्छा न हो जाने की तो फोन कर कोई बहाना बनाईए। लेकिन यह भी लगता है वहां भी तंज किए जा रहे होंगे साला झूठ बोलकर छुट्टी लिया ले लिया। वैसे ऐसी अपनी आदत भी नहीं है कि झूठबोलकर छुट्टी ली जाए। मेरे साथ यह दक्कित है कि फालतू का कुछ अधिक सोचता हंू। सोचते-सोचते कहां से कहां पहुंच जाता हूं कि पूछिए मत। बता नहीं सक ता क्योंकि आप सब हंसेंगे मुझपर। अगर ऐसा ही ऊट-पटांग आप भी सोचते हैं तो खुद समझ सकते हैं। कितना बुरा से बुरा सोचा जा सकता है और कितना अच्छा से अच्छा। खैर मैं जैसा सोचता हूं उसके लिए बस उम्मीद बची है कि एक दिन कुछ बेहतर करूंगा। सालों एक शहर में दफ्न होने के बाद किसी दिन पूरी दुनिया घूमने निकलूंगा। पैदल, साइकिल, बस, ट्रेन जो भी मिलेगा बस निकल जाऊंगा देश के हर उस कोने में जिसका नाम भी नहीं सुना है। किसी दिन अपने ऊपर अहसान करूंगा...।
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