Wednesday, 25 May 2016

परासी गांव की व्यथा

उमेश चन्द्र शुक्ल

मेरे गांव के धुर पश्चिम एक गांव परासी है। इस गांव का नाम परासी क्यों पड़ा मैं बहुत वर्षों तक नहीं जान पाया था। ऐसा भी नहीं है कि यह जाना पहचाना, देखा-सुना नहीं है।परासी से मिलते जुलते अनेक गांव मिल जाएंगे। नवल परासी, हथिया परास, परसिया, परसवां आदि। इन सबके अर्थ लगभग समानार्थी ही हैं। अभी मैं कुछ दिन पहले सोचने लगा कि ‘स्पर्श’शब्द का देशज ‘परस’ होगा। ‘परस’शब्द को पारस पत्थर से जोड़ दिया गया। वही परस पारस से बिगड़ते-बिगड़ते परसा, परासी हो गया है, किन्तु विचारणीय है कि परस से पारस हो सकता है परासी नहीं। बहुत मंथन करने के बाद मेरा मन-मस्तिष्क भतीजे के यज्ञोपवीत संस्कार के अवसर पर अपने ठीक जगह पर पहुंच गया, जब नाऊ को परसी गांव से परास (पलाश) का दंड लाने को कहा गया।तभी मुझे परासी गांव की ऐतिहासिकता का पता चला। परासी और कुछ नहीं गंवई भाषा का परास (पलाश) ही है। पलाश बिगड़ कर परास हुआ और फिर वहीं से परासी हो गया। पलाश वृक्ष की सघन बाग होने के कारण इस गांव के आदि पुरुषों ने इसका नाम परसी रख दिया होगा।पूरे जवार में परास की बागें नहीं देखने को मिलती हैं। केवल परासी गांव ही इस मामले में धनी था। वैसे परसी चौधरी और अहीरों का गांव है।दुधारू पशुओं को पालने वाले, खेतों में दिन रात एक कर पसीना बहाने वालों को परास के पेड़ों से क्या लेना देना? पलाश के अतिशय गाढ़े लाल रंग के फू ल परासी गांव के मेहनतकश लोगों को अपनी तरफ नहीं खींच पाए होंगे।दूर से जलती हुई आग का आभास कराने वाले पलाश के फूल अपनी चकाचौध की दुनिया में उन्हें रमा नहीं पाए होंगे।पलाश के फूल को ‘टेसूं’तथा ‘बंगाल किनो’ के नाम से भी जान जाता है। कालिदास से लेकर अन्य रसिक कवियों ने अपने साहित्य में इसकी खूब चर्चा की है।लोक कवि रंगपाल ने टेसू के फूलों चर्चा करके इसके महात्म्य को बढ़ाया है। ‘टेसू कचनार अनखा, न रहया विकसाय, तापर त्रिविध समीर विशासी, देत अउर धधकाय’। अन्य हिन्दी कवियों ने भी पलाश के फूल को सिर पर बिठाया है। वैसे मैं कहा भटक गया, सहित्य के उदधि में डुबकी लगाना आसान नहीं है? हां एक बात है, परासी पहले भी सम्पन्न था आज भी है। गोरस की धारा लम्बे समय से इस गांव में बहती रही है। पत्येक घरों के धन्य-कुठार अनाजों से भरे रहते हैं। दुख की बात है कि परसी केवल पलाश के वृक्षों से खाली हो गया है। पलाश की सघन बाग उजड़ चुकी है। लाल रंगे के पलाश के फूल अब यहां मधुमास में नहीं खिलते हैं। आखिर कैसे पलाश के सघन वन उजड़ गए? ब्राह्म्ण कुल में जन्म लेने वाले बालक परासी से लाए गए दंड से यज्ञोपवीत के अवसर पर द्विज बनते थे।नाइयों के लिए परासी से दंड लाना सुगम था। परासी संकट मोचन गांव था। शादी-विवाह, यज्ञ परोजन में परासी ही दूध दही देकर लोगों की इज्जत रखता था। परास के चौड़े पत्तों से भोजन की थाली बनती थी। यहीं की बनी पतरी अतिथियों की सेवा के लिए तत्तपर रहती थी। आज परसाी गांव की तरह परास शब्द के नाम वाले कितने गांव परास शब्द की सार्थकता बचाए हुए हैं, कितने खो दिए हैं हमे पता नहीं। लेकिन अपने गांव के निकट का पड़ोसी गांव परासी अपने नाम की सार्थकता खोता जा रहा है। अब वहां न तो परास के फूल आग का आभास कराते हैं और नही गोरस की सुगन्ध लोगों को परासी की तरफ खींचती है।  दुख और चिंता का विषय यह है कि परासी को अब किस आधार पर पलाशों का गांव कहा जाए? एक परासी ही नहीं  बहुतेरे गांव अपने नाम की ऐतिहासिकता खो चुके हैं। ऐसे गांव का नाम करण  करने वाले उन पूर्वजों की अत्मा पर क्या गुजर रही होगी। यह एक बड़ा सवालिया निशानन खड़ा करता है।  

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