भारतीय मानस का भगवाधारी कॉमरेड
स्कन्द शुक्ल
कहने को तो यह देश किसानों का है और देश की एक बड़ी आबादी की जीविका का आधार भी खेती है। लेकिन दु:खद है कि आज तक किसानों को देश की सियासत में वह भागीदारी नहीं मिली जिसके वे हकदार हैं। हां एक दौर आया था जब किसानों का एक नेता प्रधानमंत्री तक बना लेकिन उनकी आवाज लम्बे दौर तक बुलंद न रह सकी। तुलनात्मक रूप से आजाद भारत में भी लघु व सीमांत किसानों की वही दशा है जो गुलामी के दिनों में हुआ करती थी। लेकिन तब उनकी आवाज उठाने के लिए एक नहीं अनेक स्वर थे। उन्हीं में एक थे स्वामी सहजानंद सरस्वती। फरवरी 1889 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के देवा गांव में जन्मे स्वामी सहजानंद ने न सिर्फ स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बल्कि उसी दरमियान बेहद सशक्त किसान आन्दोलन खड़ा किया। देश-दुनिया में उन्हें एक महान किसान नेता के रूप में ख्याति मिली।
भूमिहार परिवार (वह ब्राह्मण जो खुद को कर्मकाण्डों से अलग रखते हैं) में जन्मे स्वामी सहजानंद सरस्वती के बचपन का नाम नवरंंग राय था। बेहद मुफलिसी में गुजरे नन्हें नवरंग के जीवन से तीन वर्ष की आयु में ही मां का साया भी उठ गया। बचपन बेहद मुश्किलों में गुजरा। ब्राह्मण प्ररिवार और जिज्ञासु प्रवृत्ति का होने के कारण धर्मग्रन्थों के प्रति विशेष झुकाव रहा। युवा अवस्था में ही उन्होंने गीता, वेद-पुराण का वृहद अध्ययन किया। 18 वर्ष की उम्र में पत्नी के गुजर जाने के कारण सन्यास व मोक्ष जैेसे विचार की तरफ झुकाव हुआ और एक दिन अचानक स्कूल छोड़कर सांस्कृतिक नगरी वाराणसी पहुंच गए। इस दौरान खूब भ्रमण और तपस्या की और खुली आंखों से दुनियावी छद्म भी देखा। यही वह दौर था जब वे नवरंग राय से स्वामी सहजानंद सरस्वती बने और सन्यासियों में सबसे ऊंचा दर्जा हासिल कर दण्ड स्वामी हुए। हालांकि उस समय भूमिहारों को दण्ड स्वामी का दर्जा नहीं मिलता था। लेकिन उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और वृहद ज्ञान के कारण यह दर्जा हासिल किया। स्वामी जी कभी भी कर्मकाण्डी अथवा जातीय अस्मिता में बंधकर नहीं रहे। आजीवन एक सन्यासी होने के बावजूद खुद को राजनीतिक व सामाजिक आन्दोलनों से अलग न रख सके। पहले सामाजिक रुढि़यों के विरोध में खड़े हुए और बाद में स्वतंत्रता संग्राम व किसानों के उत्थान में अपना पूरा जीवन गुजार दिए। 5 दिसम्बर 1920 स्वामी जी के जीवन का अहम पड़ाव साबित हुआ। इसी दिन पटना में गांधी जी से मिले, उनसे घंटों धर्म औरा राजनीति पर चर्चा की। यहीं बापू के विचारों से प्रभावित होने के बाद अपनी सभी प्राथमिकताओं को दरकिनार कर कांग्रेस जुड़े और ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।
1930 में नमक कानून तोड़ने और सविनय अवज्ञा आन्दोलन में हिस्सा लेने के कारण जेल गए। वापस लौटे तो किसानों की पीड़ा महसूस करते हुए जमीदारों व सामंतों के खिलाफ हल्ला बोला। जिनके समर्थन में कांग्रेस की एक बड़ी लॉबी थी। स्वामी जी का कहना था कि कांग्रेसी केवल गांधी जी का मौखिक समर्थन करते हैं, लेकिन उनके आचरण को व्यवहार में नहीं उतारते। तमाम अन्तरविरोधों के बावजूद स्वामी जी ने उसी दौर में किसानों को संगठित कर पश्चिमी पटना जिले से सामंतों और जमीदारों के खिलाफ समानांतर संघर्ष शुरू किया। किसान सभा के रूप में खड़ा हुआ यह संगठन आगे चलकर न केवल बिहार तक सीमित रहा बल्कि इंदुलाल याज्ञिक व आचार्य एनजी रंगा के सहयोग से अखिल भारतीय किसान सभा के रूप में स्थापित हुआ।
आजादी के आन्दोलन के दौरान ही एक तरफ जहां डॉ. भीमराव राव अम्बेडकर दलितों के हित को लेकर उन्हें संगठित कर उनके अधिकारों के लिए लड़ रहे थे वहीं स्वामी सहजानन्द सरस्वती का किसानों को संगठित कर एक समानान्तर आन्दोलन खड़ा करना तमाम लोगों को नागवार गुजरा। कुछ लोगों ने तब इसके औचित्य पर भी सवाल उठाए। इसका परिणाम हुआ कि 1936 में अखिल भरतीय कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी समिति ने अपने एक प्रस्ताव द्वारा सभी किसानों एवं मजदूरों के वर्ग संघर्ष पर पांबदी लगा दी। पाबंदी के विरोध में स्वामी सहजानंद, सुभाषचन्द्र बोस, नारीमैन, किशोरी प्रसन्न सिंह आदि ने प्रदिवाद मनाकर विरोध किया। प्रतिवाद विरोध में शामिल किसानों-मजूदरों पर कांग्रेस कार्यकारिणी ने एक प्रस्ताव लाकर कांग्रेस की किसी भी तरह की सदस्यता पर तीन साल तक का प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन जमीदारों व सवर्णों के विरोध में शुरू हुए ये आन्दोलन आजादी के आन्दोलन को भटकाने की कोई प्रायोजित कोशिश नहीं बल्कि एक स्वाभाविक प्रतिरोध थे। यह न कांग्रेसी समझने के लिए तैयार थे न ही यथस्थितिवादी। हालांकि स्वामी जी ने कांग्रेस से मतभेद के मुद्दे पर कहा था कि,'बेशक हमारा और उनका मतभेद बहुत बातों पर मौलिक है। लेकिन यह हमारा भीतरी मामला है। इसका संबंध केवल हमसे और उनसे है। हम इसे वहां तक नहीं ले जा सक ते जहां देश की स्वतंत्रता खटाई में पड़ जाए।'
बाबा साहब और स्वामी जी दोनों का संघर्ष वर्ग विशेष को लेकर तब भी उतना ही प्रासंगिक था जितना कि आज। लेकि न वर्ग विशेष के नायक के रूप में जो प्रतिष्ठा बाबा साहब को मिली वह स्वामी जी को क भी न मिल पाई।

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