Wednesday, 25 May 2016

जीवन जो मैंने चुना नहीं...

स्कन्द
बहुत खुशनसीब होते हैं वो ख्वाहिशें जिनके पूरा होने का इंतजार करती हैं। कुछ बनने की, कुछ करने की... कुछ गुनने की ख्वाहिश पाले उन सभी लोगों से मुझे जलन होती है जो अपनी मर्जी और शतार्ें पर जीते हैं, अपनी उम्मीदों को पूरा होते हुए देखते हैं। जलन होती है क्योंकि मैं वो नहीं कर पाता जो चाहता हूं। न बेहतर सोच पाता हूं, ना अच्छा लिख पाता हूं, न दूसरों की किसी भी तरह मदद कर पाता हूं। और तो और अब लगता है कि अच्छा महसूस भी नहीं कर पाता हूं। इतना सबकुछ ठस सा हो गया है कि कुछ मजा ही नहीं आ रहा है। पता नहीं क्या करने में मुझे सुकून मिलेगा। यह भी ठीक से नहीं समझ पा रहा हूं। आजकल ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा हूं जिससे आत्मसंतोष हो। बस हर रोज सोचता हूं कि नौकरी करते-करते सड़ जा रहा हूं...। सड़ जा रहा हूं क्योंकि कुछ करने से डरता हूं। इतना कमजोर आत्मबल। धत यार कभी-कभी तो...। ऐसी असमंजस की स्थिति बनी है कि क्या बताऊं । काफी पहले काशी बाबा (काशीनाथ सिंह) की एक कहानी पढ़ी थी। उसका शीर्षक तो याद नहीं लेकिन सारांश कुछ ऐसा है-एक बाबू जिसकी जन्दिगी का सबसे सुनहरा और अहम हस्सिा दफ्तर में बाबूगीरी करते-करते ढलान पर पहुंच गया था रिटायर होने के बाद पहाड़ों पर बने अपने घर में रहने पहुंचता है। परिवार के साथ जन्दिगी गुजर रही है कि एक शाम बाबू की नजर पहाड़ों के पीछे डूबते हुए सूर्य पर पड़ती है। प्रकृति का इनता खूबसूरत हस्सिा भी है उस दिन वह यह सोचकर एक टक उसे निहारता रहा। घर में खेल रहे बच्चों को बुलाकर कहता है देखो बच्चों पहाड़ों के पीछे कुछ दिखाई दे रहा है।... हां आसमान, कहते हुए बच्चे वहां से भाग जाते हैं। फिर बाबू चूल्हे पर खाना बना रही पत्नी को बुलाता है और कहता है देखो वहां पहाड़ों के पीछे कुछ दिखाई दे रहा है। पत्नी कहती है, हां मजूदर खच्चर पर सामान लादे जा रहे हैं। बाबू गुस्से में भड़कते हुए कहता है अरे जरा ध्यान से देखो वो... पहाड़ों के पीछे। पत्नी कहती है हां वहां सूर्य अस्त हो रहा है। बाबू चहकते हुए कहता है हां देखो कितना खूबसूरत लग रहा है। पत्नी इस पर क हती है इसमंे क्या खूबसूरत, सूरज तो रोज ही डूबता है। बाबू पत्नी की बात पर झल्ला जाता है और झिड़कते हुए वहां से यह कहते हुए भगा देता है कि जन्दिगी भर चूल्हा फंूकी हो जाओ वही करो । बाबू सूरज को अस्त होने तक निहारता रहा। देर शाम को रोज की तरह साथियों की बैठकी में पहंुचा। कुछ देर कश्मश में रहने के बाद आखिर पूछता है आप लोगों ने आज शाम को कुछ देखा। साथियों ने एक सुर में पूछा क्या कोई घटना हो गई थी क्या बाऊ साहब। अरे नहीं भाई। कुछ सकुचाते हुए कहा... किसी ने आज सूरज को डूबते हुए देखा क्या? आश्चर्य से सभी एक-दूसरे का मुंह देखकर जोर से हंस दिए। इस पर बाऊ साहब गुस्से में उठकर वहां से चल दिए। उनके मन की बात कोई नहीं समझ पा रहा था। घर पहुंचे काफी देर तक गुमसुम बैठे रहे। पत्नी ने खाने पर बुलाया तो बोले भूख नहीं है तुम लोग खा लो। धीरे-धीरे कर सभी लोग पास इकठ्ठा हो गए। पूछते रहे काहे बाबू जी तबियत खराब है या हमसे कोई गलती हो गई। बाबूजी यह कहते हुए फफक पड़े कि तुम लोग मुझे समझ नहीं पा रहे हो। सब लोग मुझे पागल समझ रहे हैं। उनके साथ ही बिना कुछ समझे बूझे परिवार भी फूट-फूटकर रोने लगा। काशी बाबा की वह कहानी मेरी पसंदीदा कहानियों में से एक है। मेरा भी तो जीवन एक कमरे से लेकर दफ्तर तक सिमटा हुआ है बल्किुल उसी बाबू की तरह। जन्दिगी के दोनों खूबसूरत पल गायब हैं। महीनों में नसीब होता है सुबह और शाम देखना।...सुबह और शाम जीवन के वह खूबसूरत लम्हे जब आप कुछ सोच सकते हैं, बंद दीवारों से निकलकर खुली हवा में सांस ले सक ते हैं। कभी-कभी सोचता हूं नौकरी छोड़ दूं। लेकिन फिर आगे यही सवाल मुह बाए खड़ा रहता है कि काम छोड़ दूंगा तो करूंगा क्या। क्या पढ़ंूगा, क्या रचूंगा। बिना पैसों के कहां घूमने जाऊंगा। बाहर इतनी बेरोजगारी है कि देखकर डर लगता है। डर लगता है कि कहीं पूरी जन्दिगी न खराब हो जाए। खैर वैसे भी क्या जी रहा हूं...यार। उधार की लगती है ये जन्दिगी। कुछ लोगों ने सलाह सन्याशी बन जाओ अब इतनी खूबसूरत दुनिया में सन्याशी तो किसी सूरत में नहीं बनूंगा। और सन्याशियों की नजर से दुनिया में दिखेगा ही क्या। जबकि मैं इसको भोगना चाहता हूं... जी भर कर। हर वो काम करना चाहता हूं जिसे करने की इच्छा मन के किसी कोने में दबी है, जिससे मैं हर दिन मुह चुराता हूं... जो मुझ पर हर रोज हसती है। एक तो साला ये नौकरी नाम की चीज बड़ी गड़बड़ है। काम का समय नर्धिारित है। हर दिन दफ्तर जाना ही जाना है। किसी दिन जब एकदम इच्छा न हो जाने की तो फोन कर कोई बहाना बनाईए। लेकिन यह भी लगता है वहां भी तंज किए जा रहे होंगे साला झूठ बोलकर छुट्टी लिया ले लिया। वैसे ऐसी अपनी आदत भी नहीं है कि झूठबोलकर छुट्टी ली जाए। मेरे साथ यह दक्कित है कि फालतू का कुछ अधिक सोचता हंू। सोचते-सोचते कहां से कहां पहुंच जाता हूं कि पूछिए मत। बता नहीं सक ता क्योंकि आप सब हंसेंगे मुझपर। अगर ऐसा ही ऊट-पटांग आप भी सोचते हैं तो खुद समझ सकते हैं। कितना बुरा से बुरा सोचा जा सकता है और कितना अच्छा से अच्छा। खैर मैं जैसा सोचता हूं उसके लिए बस उम्मीद बची है कि एक दिन कुछ बेहतर करूंगा। सालों एक शहर में दफ्न होने के बाद किसी दिन पूरी दुनिया घूमने निकलूंगा। पैदल, साइकिल, बस, ट्रेन जो भी मिलेगा बस निकल जाऊंगा देश के हर उस कोने में जिसका नाम भी नहीं सुना है। किसी दिन अपने ऊपर अहसान करूंगा...। 

परासी गांव की व्यथा

उमेश चन्द्र शुक्ल

मेरे गांव के धुर पश्चिम एक गांव परासी है। इस गांव का नाम परासी क्यों पड़ा मैं बहुत वर्षों तक नहीं जान पाया था। ऐसा भी नहीं है कि यह जाना पहचाना, देखा-सुना नहीं है।परासी से मिलते जुलते अनेक गांव मिल जाएंगे। नवल परासी, हथिया परास, परसिया, परसवां आदि। इन सबके अर्थ लगभग समानार्थी ही हैं। अभी मैं कुछ दिन पहले सोचने लगा कि ‘स्पर्श’शब्द का देशज ‘परस’ होगा। ‘परस’शब्द को पारस पत्थर से जोड़ दिया गया। वही परस पारस से बिगड़ते-बिगड़ते परसा, परासी हो गया है, किन्तु विचारणीय है कि परस से पारस हो सकता है परासी नहीं। बहुत मंथन करने के बाद मेरा मन-मस्तिष्क भतीजे के यज्ञोपवीत संस्कार के अवसर पर अपने ठीक जगह पर पहुंच गया, जब नाऊ को परसी गांव से परास (पलाश) का दंड लाने को कहा गया।तभी मुझे परासी गांव की ऐतिहासिकता का पता चला। परासी और कुछ नहीं गंवई भाषा का परास (पलाश) ही है। पलाश बिगड़ कर परास हुआ और फिर वहीं से परासी हो गया। पलाश वृक्ष की सघन बाग होने के कारण इस गांव के आदि पुरुषों ने इसका नाम परसी रख दिया होगा।पूरे जवार में परास की बागें नहीं देखने को मिलती हैं। केवल परासी गांव ही इस मामले में धनी था। वैसे परसी चौधरी और अहीरों का गांव है।दुधारू पशुओं को पालने वाले, खेतों में दिन रात एक कर पसीना बहाने वालों को परास के पेड़ों से क्या लेना देना? पलाश के अतिशय गाढ़े लाल रंग के फू ल परासी गांव के मेहनतकश लोगों को अपनी तरफ नहीं खींच पाए होंगे।दूर से जलती हुई आग का आभास कराने वाले पलाश के फूल अपनी चकाचौध की दुनिया में उन्हें रमा नहीं पाए होंगे।पलाश के फूल को ‘टेसूं’तथा ‘बंगाल किनो’ के नाम से भी जान जाता है। कालिदास से लेकर अन्य रसिक कवियों ने अपने साहित्य में इसकी खूब चर्चा की है।लोक कवि रंगपाल ने टेसू के फूलों चर्चा करके इसके महात्म्य को बढ़ाया है। ‘टेसू कचनार अनखा, न रहया विकसाय, तापर त्रिविध समीर विशासी, देत अउर धधकाय’। अन्य हिन्दी कवियों ने भी पलाश के फूल को सिर पर बिठाया है। वैसे मैं कहा भटक गया, सहित्य के उदधि में डुबकी लगाना आसान नहीं है? हां एक बात है, परासी पहले भी सम्पन्न था आज भी है। गोरस की धारा लम्बे समय से इस गांव में बहती रही है। पत्येक घरों के धन्य-कुठार अनाजों से भरे रहते हैं। दुख की बात है कि परसी केवल पलाश के वृक्षों से खाली हो गया है। पलाश की सघन बाग उजड़ चुकी है। लाल रंगे के पलाश के फूल अब यहां मधुमास में नहीं खिलते हैं। आखिर कैसे पलाश के सघन वन उजड़ गए? ब्राह्म्ण कुल में जन्म लेने वाले बालक परासी से लाए गए दंड से यज्ञोपवीत के अवसर पर द्विज बनते थे।नाइयों के लिए परासी से दंड लाना सुगम था। परासी संकट मोचन गांव था। शादी-विवाह, यज्ञ परोजन में परासी ही दूध दही देकर लोगों की इज्जत रखता था। परास के चौड़े पत्तों से भोजन की थाली बनती थी। यहीं की बनी पतरी अतिथियों की सेवा के लिए तत्तपर रहती थी। आज परसाी गांव की तरह परास शब्द के नाम वाले कितने गांव परास शब्द की सार्थकता बचाए हुए हैं, कितने खो दिए हैं हमे पता नहीं। लेकिन अपने गांव के निकट का पड़ोसी गांव परासी अपने नाम की सार्थकता खोता जा रहा है। अब वहां न तो परास के फूल आग का आभास कराते हैं और नही गोरस की सुगन्ध लोगों को परासी की तरफ खींचती है।  दुख और चिंता का विषय यह है कि परासी को अब किस आधार पर पलाशों का गांव कहा जाए? एक परासी ही नहीं  बहुतेरे गांव अपने नाम की ऐतिहासिकता खो चुके हैं। ऐसे गांव का नाम करण  करने वाले उन पूर्वजों की अत्मा पर क्या गुजर रही होगी। यह एक बड़ा सवालिया निशानन खड़ा करता है।