Monday, 14 August 2017

‘कटुओं से हार गए...’
मेरे गांव के पड़ोस में तीन मुस्लिम बाहुल्य गांव हैं-जय-विजय, ड्यूहारी और अमानाबाद। उन गांवों के होने की मौजूदगी मुझे आज तक पता नहीं चली। इतने शांत और सहज हैं वहां के लोग। वैसे बचपन में ड्यूहारी को लेकर मेरे मन में एक अजीब सा डर बैठा दिया गया था। वही डर जो हिन्दुओं के बच्चों में पता नहीं कहां-कहां से घर कर जाता है, कि मुस्लिम बहुत कट्टर होते हैं और कसाई भी उसी सम्प्रदाय से होते हैं। घर में, पड़ोस में और बकरीद जैसे त्योहारों पर जानवरों को कटते हुए देखना और इस क्रिया में ही आए दिन शरीक होने के कारण जिन स्थितियों में उनकी परवरिश होती है उनसे वे पैदाइशी ‘हिंसक’ और ‘कट्टर’ हो जाते हैं। यह मेरे और मेरे जैसे बच्चों के मन के कोने में बचपने में भरा हुआ भयानक डर था और है। हालांकि ‘जय-विजय’ के बच्चों के साथ हम क्रिकेट खेलते थे और गाली-गलौच के साथ बेइमानी कर अक्सर जीतने की जुगत करते रहते। उनसे हारने की शर्मिंदगी सही नहीं जाती थी और गांव के ‘बड़ों’ और पड़ोसी गांव वालों के तानें सुनना तो मुश्किल हो जाता था। ‘कटुओं से हार गए...’ यह वाक्य महज पराजय का बोध नहीं कराता है। दरअसल यह हमारे सम्पूर्ण संकीर्ण मानसिक विकास का प्रतिनिधि वाक्य है जो हमें यह बताता है कि हम पड़ोसी गांव से नहीं बल्कि पाकिस्तान से हारे हैं। यही वाक्य हमें बताता है कि मुस्लिमों से कितने कमजोर हैं, एक दिन जब वे हमसे लड़ने आएंगे तो हम उनके सामने टिक नहीं पाएंगे। यही वाक्य हमें बताता है कि एक दिन वे हमसे ‘श्रेष्ठ’ हो जाएंगे और हम उनके ‘अधीन’ होंगे और यह भी कि ‘उनसे’ फासला रखो नहीं तो वे आपके भीतर तक घुस जाएंगे। यही वह वाक्य था जिसमें बंटवारे का बीज तत्व निहित था। यही वह वाक्य है जिसने हिन्दुओं के जेहन में इस हिंसक सोच को जिंदा रखा है कि आज नहीं चेते तो अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाओगे। भारतीय जनता पार्टी इन्हीं तीन शब्दों की पैदाइश है। यही वाक्य है जिसने प्रवीण तोगड़िया, साध्वी प्राची, साक्षी महराज, गिरिराज सिंह और योगी आदित्यानाथ जैसों को डराए हुए लोगों के बीच ‘स्थापित’ किया। यही एक वाक्य है जिसने अब तक हुए हजारों साम्प्रदायिक दंगों में लाखों जाने ले लीं। यही वह घृणित वाक्य है जो बताता है मुस्लिम लड़कियों से बलात्कार करने पर हजारों ‘पाप’ धुल जाते हैं। यही वह वाक्य है जो हमारे भीतर हिंसा और नफरत के बीज रोपता है और हमें अपनों से प्रेम करने के लिए रोकता है।
खैर, सोमवार और गुरुवार को लगने वाली जिस मंडी से मैं सब्जी खरीदने बाजार जाता था उसके ठीक पहले ड्यूहारी से होकर गुजरना पड़ता है। ड्यूहारी में एक मदरसा है और उसमें बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ते हैं। उस मदरसे को लेकर मेरे अंदर एक अजीब सा डर बैठा था। शाम को बाजार से आते-जाते वक्त मैं अपनी साइकिल की स्पीड आंख मूंद कर बढ़ा देता था। मुझे लगता था कोई मदरसे से मेरा पीछा कर रहा है। मदरसे के मेस से आने वाली खाने की खुशबू मुझे मीट-मछली वाली लगती थी जबकि मैं शाकाहारी हूं। एक रोज बाजार से लौटते वक्त ठीक मदरसे के पास मेरी साइकिल की चेन उतर गई। वैसे तो वहां बाहर बच्चे जल्दी दिखाई नहीं देते थे लेकिन उस दिन आठ-दस बच्चे पंजे से ऊपर चढे़ पायजामा, कुर्ता और टोपी में क्रिकेट खेल रहे थे। उन्हें देखकर मेरी हालत खराब हो गई। साइकिल की चेन बुरी तरह से उलझ गई थी। काफी देर तक मैं परेशान रहा लेकिन चेन नहीं चढ़ी। कुछ देर बाद मदरसे से एक शिक्षक बाहर निकले उन्होंने मुझे परेशान देखा तो खेल रहे कुछ बच्चों को मेरी मदद करने के लिए कहा। वे आए और थोड़ी मशक्कत के बाद चेन चढ़ा दिए। उनमें से एक बच्चे ने मुझसे पूछा क्रिकेट खेलोगे। मैं लेट होने का बहाना बनाकर वहां से उटपटांग सोचते हुए निकल लिया। लेकिन उसके बाद से मुझे ड्यूहारी से गुजरने में कभी डर नहीं लगा। मदरसे से आती हुई खाने की खुशबू पर भी कभी ध्यान नहीं गया।
इन दिनों बताया जाता है कि कई मदरसों में मुस्लिम लड़कों को ‘प्रशिक्षित’ किया जा रहा है। उन मदरसों को बाहर से काफी ‘मदद’ मिल रही। तकरीरों में लोगों को उकसाया जाता है। यह एक नए तरह का उन्माद है और समुदाय विशेष में डर पैदा कर उन्हें लामबंद करने की कोशिश हो रही है। यह बहुत ही भयावह है। आखिर मेरे बाल मन में मदरसे को लेकर जो अंजाना सा डर था वह कहां से आया? जबकि उस मदरसे और उन मुस्लिम बाहुल्य गांवों में आज तक मैंने छिटपुट विवाद की भी कोई खबर नहीं सुनी इसके बावजूद मेरे जेहन में उन ग्रामीणों की छवि बहुत ही खतरनाक बनी हुई थी। यह गंभीर मसला है कि आखिर हमारे भीतर इतना डर कहां से भरा जा रहा है और इसका फायदा कहां-कहां लिया जा रहा है।
अजीब बात है हम उनके प्रति दुर्भावना रखते हैं और अपेक्षा करते हैं कि वे हमारे सामने याचना की मुद्रा में रहें। हमें बर्दाश्त नहीं है कि वे हमारे शिक्षक बनें, किसी सम्मानित ओेहदे पर जाएं और भले ही भूखों मर जाएं पर देश के प्रति समर्पित रहें। गजब की विडम्बना है भाई। मुस्लिाम समुदाय की एक बड़ी आबादी की जीविका खाड़ी देशों में कमाई से चल रही है, लेकिन यहां वे उनके समर्थन में कुछ कह देंगे तो उनकी सौ पुस्तों को गरियाते हुए उनकी फ्रेमिंग करने में पीछे नहीं रहेंगे। मथुरा में इतनी भयावह घटना हो जाती है और कुछ दिनों में सब ‘सामान्य’ हो जात है, मान लीजिए यह घटना किसी मदरसे की होती तो?
मुझे नहीं पता कि जय-विजय, ड्यूहारी और अमानाबाद के कितने प्रतिशत ग्रामीण सराकरी विभाग में काम करते हैं (फिलहाल मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी को नहीं जानता हूं) , कितने परिवारों की निर्भरता विदेशों की कमाई पर आश्रित है और कितने खेती कर अपनी जीविका चला रहे हैं? पर एक बात है उनकी जिन्दगी जैसे भी कट रही है और तमाम सामाजिक उपेक्षाओं के बावजूद वे अपने काम में रमे हुए हैं। पर धैर्य तो हर किसी का जवाब दे जाता है। आखिर इतनी नफरत कहां से आ रही है यार! भाई, प्रेम करो जिंदगी शहद हो जाएगी।

हे योगी...


भाजपइयों का अतिवाद दक्षिण के नायकों के मानिंद है, मसलन संसद में पहला कदम प्रधान सेवक मोदी ने सीढ़ियों पर माथा टेक कर रखा और दुनिया भर की मीडिया की सुर्खियों में विश्व विजेता के रूप में सामने आए. विदेशों के ताबड़तोड़ दौरों से विदेश मंत्री का अस्तित्व ही खत्म कर दिए. मोदी... मोदी... मोदी... के नारों से ब्रहृमांड गूंज उठा. अचानक से नोेटबंदी लागू कर जैसे कालाधन का नामोनिशान मिटा दिया हो, जिसे लागू करने के लिए मनमोहन सिंह जैसा अर्थशास्त्री सालों तक सिर्फ विचार करता रहा. देश को एक करसूत्र में बांधने वाला जीएसटी भी अभूतपूर्व रहा. व्यापारियों के अभी तक कुछ पल्ले नहीं पड़ा है. कैशलेस व्यवस्था का हाल तो आप लोग देख ही रहे हैं. पता नहीं किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही गई थी या उनकी आत्महत्याओं की. पलायन रोकने के लिए नौजवानों को रोजगार दिया जा रहा था, ये और बात है कि नोटबंदी ने हजारों उद्योगों पर ताला जड़ दिया और रोजगार के सिलसिले में पलायन कर गए बड़ी तादात में युवाओं को घर लौटना पड़ा. विनोद दुआ के शब्दों हमारे प्रधान सेवक किसी जादूगर की तरह हैं, ताश के पत्तों की तरह हाथ दो बार फेंटते हैं और चमत्कार हो जाता है.
कुछ ऐसे ही चमत्कारी हैं प्रधान सेवक के दूसरे वर्जन योगी आदित्यनाथ, बोले तो गरीबों के मसीहा टाइप. चार बार लगातार गोरखपुर से बतौर सांसद संप्रदाय विशेष के खिलाफ सार्वजनिक मंचों से गरजते रहे. गो और हिन्दूओं की रक्षा के नाम पर हिन्दू युवा वाहिनी नामक सेना का गठन कर हजारों नौवजवानों को गुमराह किया; उनमें नफरत के बीज बोए, उन्ही को गोरक्षा के नाम पर अब देशभर में हत्या करने की खुली छूट मिल गई है; योगी ने जब अप्रत्याशित रूप से उत्तर प्रदेश की कमान संभाली तो गोरखपुर में बतौर मुख्यमंत्री पहली सभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश के चोर, गुंडा, माफिया, हत्यारे या तो सुधर जाएं या प्रदेश छोड़ कर चले जाएं नहीं तो उनके लिए दो ही जगह बचेगी. लगा कि प्रदेश में अब कानून व्यवस्था चुस्त हो जाएगी और अपराध जैसा शब्द ही लोग भूल जाएंगे. पर उसके बाद हत्याओं का जो सिलसिला शुरू हुआ उससे आप लोग बखूबी वाकिफ है. उसके बाद योगी सरकार ने एंटी रोमियो स्क्वाड का गठन किया. जिसकी आड़ में उनके गुर्गों ने कितने युगलों के साथ बेशर्मी की हदें पार कर दीं. फिर योगी सरकार ने प्रदेश की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने के लिए महकमे को 21 जून तक का वक्त दिया पर यूपी की सड़कों की दशा पहले से और बदतर हो चुकी है. योगी सरकार की यह सब घोषणाएं बिल्कुल किसी चमत्कार जैसी रहीं. जनता में ऐसी सनसनी पैदा हुई कि लगा धरती से दानवों का अंत करने के लिए ईश्वर ने जन्म ले लिया है. योगी सरकार के रंग का असर ऐसा पड़ा कि हेलमेट की जगह गेरुआ अंगोछे ने ले लिया और गाड़ी के नेमप्लेट पर योगी सेवक चस्पा हो गया. ऐसा करने से राष्ट्रवादियों को कुछ भी करने की छूट मिल गई.
बतौर सांसद योगी आदित्यनाथ ने पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस से हो रही मौतों को खूब भुनाया. जुलूस धरना—प्रदर्शन करने से लेकर सदन तक में इस मुदृे पर घड़ियाली आंसू बहाए. सरकारों पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए निरंतर कठघरे में खड़ा करते रहे. और अब जबकि खुद सत्तासीन हैं, बावजूद इसके बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 68 लाख के बकाए के कारण कंपनी आॅक्सीजन की सप्लाई रोक देती है और 60 बच्चों की मौत हो जाती है. योगी सरकार इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेने के बजाए इसे साधारण घटना बता रही है. उनके मंत्री के अनुसार अगस्त में बच्चों की मौतें होती ही होती हैं. इससे शर्मनाक और अमानवीय कुछ भी नहीं हो सकता है. जिन बच्चों की मौत पर पूरा देश रो रहा है उन पर सरकार के मंत्री संवेदना जताने और उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेने की बजाए ऐसे वाहियात बयान दे रहे हैं.
यह समय बेहद खतरनाक है. झूठ को इतनी सच्चाई से सामने लाया जा रहा है कि वो सच लगे. इतिहास से खिलवाड़ किया जा रहा है. नेहरू का चरित्र हनन कर हेडगेवार और गोडसे को स्थापित किया जा रहा है. जवान और शहीदों के नाम पर राजनीति को चमकाया जा रहा है. राष्ट्रभक्ति के नाम पर लोगों को उन्मादी बनाया जा रहा है. विरोध करने वालों की हत्या की जा रही है. मीडिया सरकारों की अनुमति से खबरों को प्रसारित कर रही है. क्या दिखाना है और क्या हटाना है यह संपादक नहीं सरकार तय कर रही है. सोशल मीडिया पर गिरोह सक्रिय है. भोली—भाली जनता को मोदी चालिसा का पाठ पढ़ाया जा रहा है. राष्ट्रवादी नायक अक्षय कुमार को रुस्तम जैसी घटिया फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड दिया जा रहा है और दंगल जैसी मिल्म बनाने वाले आमिर खान को देशद्रोही बताया जा रहा है. यह देश अब तक के सबसे खतरनाक समय से गुजर रहा है.